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Sunday, May 24, 2020

अंग्रेजों ने लगाई थी हथकड़ी, उसी देश में दिलाया तिरंगे को सम्मान

जसप्रीत सिंह साहनी, नई दिल्ली अक्षय कुमार की एक फिल्म आई थी 'गोल्ड'। आजाद भारत के पहले हॉकी ओलिंपिक गोल्ड की कहानी। यह कहानी थोड़ी फिल्मी थी पर असल कहानी भी कम रोमांचक नहीं। 12 अगस्त सन 1948। एक आजाद देश के रूप में भारत ऐतिहासिक 15 अगस्त, यानी अपनी आजादी की पहली वर्षगांठ से सिर्फ 3 दिन दूर था। देश से 7000 हजार किलोमीटर दूर लंदन में 11 खिलाड़ी अपने पूर्व शासक- ब्रिटेन- के खिलाफ एक अलग जंग लड़ रहे थे। वेंबले स्टेडियम पूरी तरह भरा हुआ था। मौका था ओलिंपिक पुरुष फील्ड हॉकी का फाइनल। ब्रिटेन इससे पहले भारत के खिलाफ खेलने से इनकार कर चुका था। उसका कहना था कि यह उनकी एक कॉलोनी है। हालांकि उस दिन उसके पास कोई मौका नहीं था। भारत आजाद देश था और खिलाड़ी भी पूरी आजादी के साथ खेले। भारत ने फाइनल में ब्रिटेन को 4-0 से मात दी। यह उसका लगातार चौथा ओलिंपिक गोल्ड था। और पहली बार आजाद भारत का तिरंगा ओलिंपिक के मंच से सबसे ऊंचा लहरा रहा था। इस फाइनल में ने दो गोल किए। पंजाब पुलिस में सब-इंस्पेक्टर ने 1948 में अपना ओलिंपिक डेब्यू किया। फाइनल में उन्होंने दो और तरलोचन सिंह और पैट जेनसन ने एक-एक गोल किया। इस वाकये को याद करते हुए बलबीर सिंह ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया को कहा था, 'इस बात को 70 साल से ज्यादा का वक्त बीच चुका है लेकिन ऐसा लगता है जैसे कल की बात हो। तिरंगा धीरे-धीरे ऊपर जा रहा था। हमारा राष्ट्रगान बज रहा था। स्वतंत्रता सैनानी मेरे पिता के शब्द 'मेरा झंडा, मेरा देश' मेरे कानों में गूंज रहे थे। मुझे आखिर समझ में आया कि इसका क्या अर्थ है। मुझे ऐसा लग रहा था कि तिरंगे के साथ मैं भी हवा में ऊंचा जा रहा हूं।' बलबीर सिंह ने इसके बाद दो ओलिंपिक गोल्ड और जीते। 1952 हेलसिंकी और 1956 मेलबर्न। मेलबर्न में वह टीम के कप्तान थे। लेकिन उनकी याद में 1948 का गोल्ड सबसे अहम रहा। वह शख्स जिसे एक बार हथकड़ी लगाकर जबर्दस्ती पुलिस फोर्स में भर्ती किया गया और फिर पंजाब पुलिस से खेलने के लिए मजबूर किया गया उसके लिए यह हिसाब चुकता करने का मौका था। कुदरत का इंसाफ देखिये, वही पुलिस अधिकारी सर जॉन बैनेट जिसने गिरफ्तारी का ऑर्डर दिया था, भारतीय टीम की अगुआई करने लंदन एयरपोर्ट पहुंचा था। उसने बलबीर को गले भी लगाया। भारत के 1948 ओलिंपिक गोल्ड की खुशी में सारा देश झूम उठा। यह आजाद भारत के लिए एक बड़ा जश्न का माहौल था।


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